चाहे जितने लेख लिखो तुम, चाहे जितने व्याख्यान करो

गैरों की भाषा में चाहे तुम ख़ुद पर अभिमान करो


पर जब चोट हृदय को पहुँचे, जो पहली बोली आती है

अपनी ही भाषा की तुमको याद दिला के जाती है


मन की बात सुनाने को तब कोई शब्द नहीं मिलता

गैरों की बोली में अपनापन नहीं मिलता