कह रहे है ज़ालिम सन्नाटा भरो
खुद की कहानियों में
कही डूब ना जाना
अतरंगी परेशानियों में
ये जो वक्त है न
जज़्बातों को भी रोक लेता है
सुलझी हुई पहेलियों में भी
उलझनें ख़ोज लेता है
थम थम के अहसास करो
मरते मरते भी दम से लड़ो
ये जो बदन में आग है
इसके ताप से तो डरो
अपटन से जो कालिख़ जमी है
अंदर थोड़ी नमी है
जल जल के तो हम पके है
थोड़ी अकड़ तो लाजिमी है..

~अमन