सुकून से कभी बरसोगी क्या
हमारी तरह तुम भी तरसोगी क्या..
तुम्हें पता है दर्द हसद की
हलाहल हुई जुबां शहद की..
कैसे बदली अदाएं रुखसार की
चेहरें तक भूल गई प्यार की..
तुम्हारी हक़ीक़त हम जानते है
सब दिखावा था यह भी मानते है
पता है नखरें खानदानी है
क्या कहे सब बेइमानी है
तुम्हें याद कर, फिर भूल जाता हूं
पर्दों को बाहें समझ झूल जाता हूं
~अमन


