हे स्त्री तेरे बारे में क्या लिखूं, कितना लिखूं
धरती से अम्बर तक कितना सोचूं
सती का प्रियवर के लिए प्यार लिखूं
या उर्मिला का त्याग लिखूं
पार्वती का दुर्गा अवतार लिखूं या रक्त चंडी का
संहार लिखूं
सीता पे हुए अत्याचार लिखूं या निर्भया के साथ हुए बलात्कार लिखूं
कल्पना की बादलों पार की कहानी लिखूं या मीरा की प्रेम कहानी लिखूं
बताओ रानी के तेवर लिखूं या पद्मिनी का जौहर लिखूं
रेखा की नृत्य अलंकार लिखूं या लता दीदी का स्वर झंकार लिखूं
कंधो पे बांध शिशु को, धान रोपती अम्मा की प्रेरणा लिखूं या पेड़ वाली अम्मा थिमक्का की विवेचना लिखूं
गर्भ का दर्द लिखूं या वृद्धा आश्रम वाला सरदर्द लिखूं
रोज तुम्हे सुनाए जा रहे ताना लिखूं या दहेज के लिए तुम्हे जलाना लिखूं
रोज जो मिलती तुम्हे दुत्कार वो लिखूं या होती घरेलू हिंसा की शिकार वो लिखूं
तुम्हारे कपड़ों पे चलाए गए बयानवीर लिखूं या तुम्हारे लिए चलाए गए अश्लील शब्दों के तीर लिखूं
हर रोज क्या क्या सहती हो वो लिखूं या शारीरिक शोषण से कितना दहकती हो वो लिखूं
हे स्त्री तुझपे क्या लिखूं कितना लिखूं
अपने मां के किए गए परोपकार लिखूं या बहन के संस्कार लिखूं
अंधेरी रातों में सुनाई गई दादी के कहानी लिखूं या नानी के नटखट अंदाज़ पुरानी लिखूं
लिख दू की तुम्ही जान हमारी, प्राण हमारी
तुम्ही टूटे दुनिया की ताकत सारी
कभी मां प्यारी तो कभी बहन दुलारी
घर की लक्ष्मी बेटी हमारी
पत्नी बन कर बांधी घर की डोर सारी
तुम्ही धरती , तुम्ही अम्बर
तेरे बिना अधूरे दिगंबर।
~अमन प्रताप सिंह
