जाहिलों को क्या क्या सिखाया जाए
संस्कार वसीयत में मिली नहीं,
अब क्या संस्कार भी सिखाया जाए...
सारे गुरूर धरे के धरे रह जाएंगे
जब सरेआम जलील किए जाओगे
हाथी बनकर कुचलना चाहते हो
चीटियों के हिम्मत से हार जाओगे..
चित्र छप जाने से चलचित्र नही चलते
आम से खास यूंही नहीं बनते
घिसते रहने से हीरा चमकता है
पागलों का क्या है, और पागल बनते है...
विशुद्ध "सल्फेट" से क्या लड़े हम
कल को कह दे, वो नहीं थे हम
लेकिन याद रखा जाएगा "खींचते शब्द की बाण"
जब भी मिलो, पेश करेंगे शरीफों वाली "म्यान"..


