सरकारी नौकरी

सुनो भइया हम करते है तैयारी

चाहते है करना नौकरी सरकारी

जिधर देखो उधर है मारामारी

नहीं तो बेचेंगे भइया तरकारी।


दिमाग अटकता नहीं कही एक पर

कभी एसएससी, कभी बैंक पर

सिविल सेवा पर भी एक नजर मारी

क्या करे साहब, बहुत है बेरोजगारी।


प्राइवेट कामों में बहुत भागम भाग है

निकाल देते है कभी भी समझ के झाग है

बाबू बनने में गजबे आग है

है दागी, लेकिन फिर भी बेदाग है।


सालो से पड़े है इसके चक्कर में

क्यूंकि कोई न है इसके टक्कर में

मुहब्बत छोड़ा, घर परिवार छोड़ा

जो आया, इसके आगे हर वो दीवार तोड़ा।


क्या क्या न करते इसके लिए

करते है दूर दूर तक साइकिल की सवारी

परिवार का बोझ है बहुत भारी

इसलिए चाहिए नौकरी सरकारी।


      ~अमन