इक रोज़ जब आंखें खुली मैं किसी सफेद एंबेसडर कार जिसमें लाल बत्ती लगी हुईं थी, उससे उतर रहा था। पूरा गांव मेरा मानो इंतजार कर रहा था, जैसे किसी अंग्रेज को देश छोड़ने को मजबूर किया हो। मगर, ये आंखों में उम्मीद के सपने लिए , मेहनत का जो गुब्बारा हमने सालों से फुलाया था, उसपर भरोसा था। मेरी पहचान शुरू से शरीफ़, तेज तर्रार , नाम रौशन करने वाले विद्यार्थी से है और आज़ जब मैं शायद थोड़ा सफल हुआ तो सबको मुझे देख के उम्मीद जगी। पापा के आंखों में खुशी अश्क के रूप में जमीं की प्यास बुझा रही थी। सारे हजारों आंखें यूं तक रही थी, आह! जैसे कोई दक्षिण के मूवी का हीरो, "अल्लू अर्जुन " आ गया हो। इतने शानदार दृश्य के बीच में फोन की रिंग बजी "मेरा यार हंस रहा है, बारिश की जाए" और उधर से आवाज़ आई, "उठबे ना दस बज गेलाई"। बस सेवा समाप्त.. साला पता ना चला IAS बने थे की जज... इक तो ई #Aspirants वाले संदीप भैया का भूत और दूसरा ई "lockdown" ससुरा सपना में भी गेम खेल दे रहा है ...