सबको जरूरत है सांसों की

कौन बताएगा संख्या लाशों की

आग की लपटों से आसमां भरा है

मिट्टियां बंजर दिख रही बिन घासों की..


कतार में खड़े की बेड मिल जाए

जो सांसें फिज़ाओं में है, वो 

सिलेंडर में भड़ा मिल जाए...


ना मालूम की कब तक घुटेंगे ऐसे

ईश्वर ना सही, कोई सरकारी

अस्पताल ही मिल जाए...

मुंह बांध खड़े है, कोई

दवाई दिलवाने वाला इंसान महान 

मिल जाए..


गिद्धों का क्या, उन्हें बस नोचना आता है

मरते मरते भी कफ़न उठा ले जाते है

ख़ुद की जिम्मेदारी खुद उठाइए

सरकारी व्यवस्था तो जीवित को भी  

मरा हुआ बताते है...


अब समय साथ देने का है

जो मुसीबत में है, उनके तरफ

हाथ बढ़ाने का है..

ये तूफ़ान कुदरती है

मगर कैसे भी "कोरोना" को

हराने का है...