ये शरारती शहर अब ख़ामोश सा है

कदम रखते ही जहां मन चहक जाता था

अब वो खुद में ही मानो मदहोश सा है..


क्या हुआ, कैसे हुआ

कोई बताने को आता नहीं

बनावट वही की वही है

बस कोई रात सजाने को

अब आता नहीं..


चारों तरफ़ रौशनी ही रौशनी है

मगर काली घटाओं का खौफ़ है

सन्नाटों का शहर रह गया है बस

बाक़ी बेचैन सब है इस हाल से लेकिन

कर रहे "शो ऑफ" है..


वो जिंदा शहर अब गुमशुदा हो गया

सब सब से जुदा हो गया

दीवार से दीवार बातें करती है यहां

इंसान सब मानो खुदा हो गया...