अफ़सना कहे या गीत मोहब्बत की सुनाए

तुझमें था मै और मुझमें थी तुम, ये किसे बताए

जब बिना वजह के याद आएंगे हम

तो सपनों में ही इश्क़ क्यों ना जताए..


जब अश्क झील सी आंखो से गिरेंगे तो

हमारी यादों के आंचलो में समेट लेना

जब भींग जाए नयन तेरे तो 

साथ गुजारे गए उन पलों में लपेट लेना


जब ख्वाबों के नए राजा मिलेंगे तुम्हे

तो कहना उससे एक महाराजा और था

तुमने उसे किस ओर से खुद में मिला लिया

फिर भी कह देना उससे, तुम्हारे दिल में आने का

एक दरवाजा और था


मै दरख्तों से तुम तक पहुंचा था, वो खुले दरवाजे से आयेगा

मै नींदों में तुम तक पहुंचा था, वो आंखों के रास्ते आयेगा

हमने जिस तरह तेरे बालों को सवारा है क्या वो सवार पाएगा

हमने जितने नखरे सहे है तुम्हारे क्या वो भी सह पाएगा


हमे जो सुनाती थी, क्या वही गाने उसे भी सुनाती हो

क्या तुम उसे भी खुद को शाहिद का फैन बताती हो

वो किटकैट का चॉकलेट उससे भी मंगवाती हो

मां बगल में बैठी है, ये वाला बहाना उसके सामने 

भी बनाती हो


माना हम थे गली मुहल्ले के उचक्के

तेरे खुशबू से रुक जाते थे गाड़ियों के चक्के

हमने नहीं तुमने हमे मारे थे धक्के

वहीं से हमारे रिश्ते हुए थे पक्के


~अमन