परिवार

कहां गए वो रात सुहाने

जब आते थे घर वाले हसाने

साथ बैठकर माहौल सजाने

कौन चुकाएगा ये हर्जाने?


अब वो इच्छाएं नहीं

आ जाओ फिर से सब वही

अरे क्यों खफा हो एक दूसरे से

कोई किसी से नाराज नहीं।


ये गम के रिश्ते छोड़ दो

कम से कम अपनो को जोड़ दो

ये झगड़ों का पत्थर फोड़ दो

मन के अरमानों को हिलोर दो।


क्या हुआ? कैसे हुआ? क्यों सोचते हो?

पुराने जख्म क्यों खरोचते हो

अंदर ही अंदर खुद को कचोटते हो

क्यों ये अनबन की थाली परोसते हो?

    ~अमन ~