ज्यादा नमक ज़हर हो जाता है
छू ले प्यार से तो जिन्दगी संवर जाता है..
पसीने से तर बतर चेहरे
चूल्हे फूकते फुकते दोपहर हो जाता है..
हर बात में राय शुमारी होती है उनकी
"ना" कहने पर, पूरा घर झगड़ जाता है..
सारे साड़ियां बंद पड़े है अलमारियों में
बदन के कपड़ों से बदन जकड़ जाता है..
इन अंधियारों में जगमगाती जुगनू है वो
बुझ जाने पर सबको ख़बर जाता है..
हां कभी कभी चिल्ला देता हूं उनपर
मगर वो ना हो तो सोच कर दिल सिहर जाता है..
कब तक यूं बंदिशें बांध रखेगी उनको
उनके तकलीफों के साथ हमारा "घर" जाता है...
"मां" की ममता सब कहते है
मैं मशीन कह रहा हूं
बीना थके, दिन रात चलता शरीर
हां हां, मैं मेहनत का "जीन" कह रहा हूं....


