संभाले संभल ना रहा 

नींद के साथ चैन भी जा रहा

जंग चल रही इक खुद से अंदर

कैसे ये वक्त भी ना गुजर रहा..


बड़े बेखबर थे हम इस हाल से

हिस्से बस दुख का पहाड़ आया 

सबकी फिक्र करते करते दिल में

एक अजीब सा सवाल आया..


मौत तमाशा हो गई है

हमें जगाते जगाते जिन्दगी सो गई है

किसका किसका समय सही है

ये बताने वाली घड़ी भी खो गई है..