शर्त थी कि वे बेख़ौफ़ गरजेंगे

उनके रहते कोई झोपड़ी ना उजरेंगे

सत्ता मिला की गुमनाम हो गए

अब तो बस वो जुमले गढ़ेंगे..


दर्द बांट ना सकते तो कुरेदते क्यूं हो

जानते है तुम्हे फिर यूं नोचते क्यूं हो

जब उखाड़ना ही था महल हमारा

तो बेवजह पूछते क्यूं हो..


हम रह लेंगे सड़क किनारे फुटपाथों पर

तुम अपना सोचों दाग लगेगी जो हाथों पर

ख़ैर तुम्हें तो आदत है जमीर बेचने की

मिटा सको तो मिटा लेना, कलंक लगी है

जो शहर के नाथों पर..

~अमन