ये शहर, ये राहें पुराने सब भूल बिसरे रह गए है
हम नई आशियाने ढूंढ़ रहे है बस घर बनाने रह गए है..
ये जलेबियां, समोसे सब खाने के लाले पड़ गए है
अब तो "हाई सुगर" है, यही ना खाने के बहाने रह गए है..
"जिंदगी" में अब बचा ही क्या है, बस मुखालफत में जी रहे है
साथ रहने वालो का क्या होगा,यही सोचकर जिंदगी चलाने रह गए है..
समय कब करवट लेगा, इंतज़ार बस इसका है
बाकी तो "फेसबुक, वॉट्सएप, इंस्टा" पे फ़िज़ूल में समय बिताने रह गए है..
उम्मीद बस ऊपर वाले से है कि कुछ करिश्मा हो जाए
फ़कत अब तो बस उनके नाम पर भाग्य आजमाने रह गए है..


