ये चितकारे जो सुनाई दे रही है

तकलीफें जो दर्द बयां कर रही है

सब इक रोज़ ख़त्म होगी..


कितने बच्चों को अनाथ करोगे

कितने आंखों के तारों को तोड़ दोगे

सारी पीड़ा तुम्हें ही सुननी होगी...


नरमी बरत , अपने ही बच्चों पे

कौन जुल्म करता है...

टूटती उम्मीद, बूढ़ी मां के पैरों में

पड़ा कलेजे का टुकड़ा निर्जीव हुआ..


वो नन्हीं बच्ची , मरने के बाद भी

जिसको मां का दुलार भी नसीब न हुआ

चीखते चिल्लातें , एंबुलेंस की आवाजें

दहकते कच्चे लकड़ियों में राख होती 

कितने परिवार की नाजें..

मानों लिस्ट कर दी है तैयार

आज वो जाएगा कल तुम जाओगे यार..

दया धरती के रचनाकार

मानव के पालनहार...


~अमन