कहिए साहब
दीदार को आए है
इश्क़ खरीदने बाज़ार को आए है..
आपके सिक्कों की खनक
से यहां कोई नहीं बिकेगा
हां , हो अगर नोटों की
गड्डियां तो बाज़ार भी बिकेगा...
ज़ख्म कुरेदने को ये
रिश्तों का बाजार नहीं
आए हैं तो आइए मगर
आपका कोई भी पैंतरा
असरदार नहीं ..
गुलाबी पत्तियों से ही
गुलजार होता है ये राजदार
सब पुरानें अखबार है यहां
डूब ना जाए आपकी पतवार..
आप तो भूखे ठहरे
बदन देख के आंखें तरेरे
थोड़ा ख़ुद को खींच लीजिए सरकार
आपके चरित्र से परिचित है बरखुरदार...
~अमन


