हम वहीं से आते है, जहां बहार है
जहां के राजेन्द्र प्रसाद और जय प्रकाश जी जैसे होनहार है
जहां का लिट्टी चोखा शानदार है,
हां वही से, जहां हर वर्ष आती दहाड़ है।
याद है, आपातकाल में हमारी ही ललकार थी,
जिसने गिरा दी इंदिरा की सरकार थी,
हमारे यहां ही मांझी लिए अवतार थे,
हां वही से, जहां पैदा हुए अशोक सम्राट थे।
इस गौरवपूर्ण इतिहास का न रखा किसी ने मोल
अब यहां बोलती है भइया बस पिस्तौल
जात पात में बांट कर, नेताओ ने उड़ाया है माखौल
मासूम जनता को समझते है बकलोल।
आजादी के इत्ते साल बाद भी न आया कोई कारखाना
खाली है खजाना, फिर भी चचा ने बंद कर दिया महखाना
सारे चचा चोर है और सब है भ्रष्टचारी
युवा नेता के नाम पर भी कुछ कर रहे पिता जी की सवारी।
फिर शुरू होगा वहीं व्यापार
बह रही है चुनावी ब्यार
लगेंगे, नेताओं के दरबार
हां भइया यही है बिहार।
होंगे अब वादों कि बौछाड़
एक दूसरे पे करेंगे घातक प्रहार
जब खत्म हो जाएंगे चुनाव
लगाएंगे मिलकर बेड़ा पार।
कहने को तो है , सुशासन की सरकार
इससे पहले तो थी लालटेन कि सरकार
सबने बारी बारी से चलाया अपना दरबार
लेकिन कोई न कर पाया बिहार का बेड़ा पार।
~अमन~
