हम हर साल सजाते है घर बाड़ अपना

दहाड़ उजाड़ देती हर साल सपना...


छोटे छोटे टुकडों में जो ख़्वाब पालते है

उछलते पानी के सैलाब में खुद को रोज़ ढालते है..


अपनें हाथों से जो दीवार खड़ी की थी

वो भी दहकर कही और पड़ी थी..


रातें लहरों की आवाजों से गूंजती है

और दिन में जिन्दगी खानों के लिए जूझती है..


आसमां से पानी, जमीं पे पानी

आकर देखो हमारा हाल कोई, हर वर्ष यही कहानी..


कुछ तो उपाय होगा, बचाया जाए हमें

इस बदबूदार जिंदगी से कैसे भी निकाले हमें..