हां वो मेरे साथ पढ़ता था

स्कूल में मेरी मदद भी करता था

हां मै उसे दोस्त मानती थी

लेकिन उसके अंदर के निकम्मेपन

को भी जानती थी।

मेरी नज़र ब्लैक बोर्ड पे होती थी

और उसकी मुझपे।

यूं देखता रहता था जैसे

चकोर चांद को।

वो मेरे दिल के दरवाजे पे

चौकीदार बन बैठा था पर

फिर हमने भी दरवाजे खोल

दिया और धड़कनों में उसे जगह दे दी

फ़िक्र इतना है उसे की

हर बात में जिक्र मेरी करता है

यूं ही इश्क़ के मुकाम तक नहीं पहुंचे हैं

लड़ना परा समाज के मुश्किलात से

घर वालो के जज़्बात से

विध्वंशक हालात से

पर खड़े रहे दोनों

एक दूसरे के लिए

शुरुआत से।

क्या क्या न करना पड़ा

इन 17-18 साल के सफर में

रिश्ते टूटे, अपने रूठे

बहुत कुछ खोया जिंदगी

की इस भषड़ में।

बस अब कुछ काम है बाकी

तुम मिल गए, अभी कुछ

मानने को है बाकी।

कुछ बनने कि है कोशिश 

मदद कर ए ईश्वर 

 बस यही है गुजारिश ।

    ~ अमन