शहर जल जाए तो हमें क्या गम

मृत्यु हो जाने दो, लगाएंगे नौकरी वाला मरहम..


ना वो कभी हमारे थे, ना होगे

अब "भक्त" ना बनने कि खाओ कसम..


धू - धू के जल रहा है, जहां मेरा

पानी डालने तक ना आए ये बेशरम..


ये "अनुराग" कैसे लौटेगा, कौन मां के लिए यूं जान देगा

"निर्दोष" निहत्थे पर टूट पड़े ये बेरहम..


इंसाफ तो होगा, दरबार लगेगा सबके गुनाहों का

"आह" लगेगी माताओं की और अब "हिंसा परमो धर्म"...