छल- कपट से भरा ये शहर,
लेकिन रुकते नहीं बस चलते जाते हैं जरा सम्हलकर जनाब,
यहां अमृत के प्याले भी विष घोल के दिए जाते है रिश्ते- नाते,
प्यार- मोहब्बत सब भ्रम है यहाँ पैसा ही सबका धर्म है
पैसे के लिए इंसान की भी बलि चढ़ाते है
जरा सम्हलकर जनाब यहां अमृत के.
रात तो काली ही थी अब दिन भी काले हो गए ,
और इस कालिख में इंसान गुम होते चले जाते हैं
जरा सम्हलकर जनाब यहां अमृत के .
अगर पाना है मंजिल,
तो पता मत पूँछ किसी से मुशाफिर अक्सर यहां गुमराह किए जाते हैं
जरा सम्हलकर जनाब.