
छल- कपट से भरा ये शहर,
लेकिन रुकते नहीं बस चलते जाते हैं जरा सम्हलकर जनाब,
यहां अमृत के प्याले भी विष घोल के दिए जाते है रिश्ते- नाते,
प्यार- मोहब्बत सब भ्रम है यहाँ पैसा ही सबका धर्म है
पैसे के लिए इंसान की भी बलि चढ़ाते है
जरा सम्हलकर
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