ये कागज़ी पैरहन जो है
और जो हैं ये
ख़्वाब मलमल के,
जिनपे नूर के गिरे कुछ छीटें
और कुछ कमख़्वाब से गढ़े मिसरे हैं,
बस वैसे ही हैं जैसा तुमने छोड़ा था।
नक्श धूमिल और नज़र धुंधली सी
वो बेतुके ग़ुलाब
और न मुरझाने की दलील
उसपे ख़ून का अनसुलझा उबाल
और सौ बार पढ़ी अज्ञेय की कविताऐं वैसे ही हैं
जैसा तुमने छोड़ा था।
शहतूत की शाख
और सफ़ेद उँगलियों की
याद रसमलाई गोलगप्पे
और फिर से रसमलाई,
गर्मियों की छत और जाड़ों में पश्मीना,
और पन्नों पे टंके लब्जों से
बिगड़े-बने पुराने ख़त सब वैसे ही हैं
जैसा तुमने छोड़ा था।
- आलोक तिवारी