कभी कागज था आज पतंग हूं मैं..

उड़ तो जाता हूं पर आजाद नहीं हूं मैं

कभी एक तीली का धनुष था,

बिना कमान का तीर था,

लग तो जाता निशाने पर....

लेकिन जब से कागज के ऊपर बैठा हूं,

ना तो धनुष हूँ, ना बिना कमान का तीर हूं...

क्योंकि कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों से,

गोंद में लिपटे धागों मेें,

कागज के किनारों में,

कैद हो गया हूं मैं...

पतंग बन गया हूं मैं ! पतंग बन गया हूं मैं !

पतंग यानि पर तो है पर आजाद नहीं हूं !

तंग यानी हैरान रहता हूं खुद जब उड़ जाता हूं,

परेशान कर देता हूं सबको जब कट जाता हूं,

खुश कर देता हूं उसको जिसको मिल जाता हूं,

यानि आजाद नहीं हूं मैं ।। पतंग बन गया हूं मैं ।।

काइट यानी काई पो चे कट तो गया हूं पर आजाद नहीं हूं !

इट यानि यह खुश है मुझे काट कर,

वह उदास है मुझे खोकर,

यह जश्न में है मुझे लूटकर,

वह लड़ रहा है मुझे फाड़ कर,

यानी आजाद नहीं हूं मैं ।। पतंग बन गया हूं मैं ।।

गुड्डी यानी अच्छी बात है मैं किसी के हाथ ना लगा पर यहां भी आजाद नहीं हूं !

डोर फंसी है किसी तार पर,

मैं अटका हूं किसी पेड़ पर,

छूड़ा रहा हूं खुद को हवाओं के दम पर,

और बेहतर फस रहा हूं पत्तियों से लड़कर,

डी यानि दीवार पर चिपका बढ़ा रहा हूं शोभा किसी और के घर पर,

जल्द आएगी दिवाली और पड़ा मिलूंगा कूड़ेदान पर,

बन जाऊंगा खाद मिल जाऊंगा मिट्टी में,

फिर तोड़ दूंगा दम मैं,

यानी आजाद नहीं हूं मैं, पतंग बन गया हूं मैं

पतंग बन गया हूं मैं

कभी कागज था आज पतंग हूं मैं ।।

उड़ जाता हूं पर आजाद नहीं हूं मैं ।।