बादल बरस भी लिए

और बूंदे भिगो भी न पाई प्यासे अंतर्मन को

ये प्यास और ये प्यासापन

अब उस सावन के इंतजार में है।

ना जाने कितने सावन यूं ही गुज़ार दिए।

ना भिगोया तन को 

ना मन को 

शायद वो सावन जिसकी तलाश है।

वो बूंदे अभी बाबस्ता बसर नही है

इस अधूरे शजर को 

इक पेड़ के मानिंद ठहरे हुए।

राहगीर को।

Kuldeepdwivedi "Kd"