●● तालाबंदी ●●
दिन पर दिन हमारे देश में भी कोरोना के मरीजों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। महज़ 113 पीड़ितों की संख्या से शुरू होने वाले कोरोना के मरीज अब लाखों की तादाद में हो गए हैं। डॉ किरण सोच में डूबी समाचार चैनलों को लगातार बदलती जा रही थी। जैसे कोई चैनल उसकी चिंता का निदान कर दे। लेकिन….ऊपर से लॉक डाउन बढ़ाने का निर्णय भी सरकार ले चुकी है। कैसे सम्हालेगी वो घर और अस्पताल को इन परिस्थितियों में ? उनके बच्चों का क्या होगा? जिन्हें अब तक वो एक सेविका के ऊपर छोड़कर जाया करती थी। तालाबंदी के कारण अब वो भी नहीं आ पा रही है। इतने दिनों तक वो और पतिदेव मिलकर सम्हाल रहे थे। अब तो पतिदेव की ड्यूटी भी कोरोना मरीजों के इलाज में लगा दी गई है और ब्लड बैंक में जॉब होने के कारण उसकी ड्यूटी और कठिन होने वाली थी। वो बिल्कुल परेशान हो गई। अपने को एकाग्र कर कुछ सोचा फिर एक अडिग निर्णय लिया उसने। अपनी बूढ़ी सास पर बच्चों को छोड़ वह अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर हो गई। कई कई दिन वह अपनी ड्यूटी पर ही रह जाती थी। बीच में जब घर आती तो नहाने के बाद भी अपने और घरवालों के बीच एक शारीरिक दूरी बनाए रखती। हॉस्पिटल से कभी मिलने आती तो घर के बाहर से ही मिल, हृदय को कठोर बना फिर कर्तव्य पालन करने निकल जाती।
वह दिन- रात मरीजों की सेवा में लगी रहती। उन मरीजों में उसे अपने लोग नज़र आते और वह दुने उत्साह से अपने पुण्य काम में लगी रहती। उसे एक तरह की संतुष्टि मिलती थी कि उसने अपने कर्तव्य को तो चुना, लेकिन अपने परिवार को अनदेखा कर नहीं।एक डॉ के लिए उसके मरीज़ भी परिवार के सदस्य की तरह होते हैं। आज उसे डॉक्टर्स के सादे लिबास पर गर्व हो रहा था।
** अलका 'सोनी' **
लेखिका व कवयित्री
बर्नपुर, पश्चिम बंगाल।
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