◆◆ शक्लें ◆◆


भरकर रंग कूची में

रोज नई शक्लें 

बनाते हैं

कुछ उदास सी

कुछ हँसमुख

कुछ निर्विकार

बनाते हैं


लेकर भाव उन

शक्लों पर

सजाते हैं

फिर करने को 

प्राण-प्रतिष्ठा उन 

आदमकद मूर्तियों में,

स्वयं आत्मा को

उनमें उतार देते हैं


धीरे धीरे सजीव 

होने लगता है पूरा

ब्रह्मांड, 

बात करने लगती हैं

वो आदमकद मूर्तियां,

उग आते हैं कितने ही

वृक्ष-विटप और

फूलों की कई प्रजातियां

उस कैनवास पर



अलका 'सोनी'