चाँद....

      

इस चाँद को जाने क्यूँ

मजहबों में बंधना 

नहीं आता

हो उनकी ईद या

अपना करवाचौथ 

मुस्कुराकर 

गगन पर छा जाता


कभी प्रेयसी का मुख 

झिलमिलाकर 

स्मरण कराता

तो कभी प्रिय की

मुस्कान की याद दिलाता

ये चाँद हर आंगन से 

क्यूँ एक सा है 

नज़र आता.....



अलका 'सोनी'