मां के आंचल में पली थी,
पिता कि उंगली पकड़ कर चली थी,
मै इनके ही बग़ीचे की एक नन्हीं सी कली थी,
लगती थी जब नन्हीं सी भी चोट मुझको तो
मां की आंखें भर आती थी,
बड़े ही नाजो से में पिता की
बाहों में पली थी,
फ़िर आई एक ऐसी रीत की
मै इनके लिए पराई हो चली थी,
मां के आंचल में पली थी,
पिता की उंगली पकड़ कर चली थी।
