क्या लिखूं मैं उनके लिए

जिनके ज़रिए

मैं बन पाया,

जिनके ज़रिए हम बन पाए

और हां कटु है; पर सत्य है जितनी एहमियत देनी थी

आज भी

हम वो नहीं दे पाए उनको

ये अंधा बहरा समाज आज भी कहता है

"लड़की है इससे क्या ही होगा?"

ये जानते हुए भी कि

वो हिमालय की पुत्री वो ही काली रूप धारणी

वो सर्वप्रथम शासकों में अंग्रेज़ो के ख़िलाफ़ कित्तूर चिनाम्मा

वो निर्भया सी झांसी रानी

तो कहीं वो तवायफ़ से स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व करती बेगम हज़रत महल

वो फ़िज़ाओं में बहती सुनीता तो कभी कल्पना बनी

तो कहीं वो सबसे ऊंची कोह पर दिखी

उसने कुछ ना छोड़ा

इस अंधे बहरे समाज को सब करके दिखला दिया

फिर भी इन वीरांगनाओं को सही ना आंक सका

अंधा बहरा जो ठेहरा

अरे अब तो कलम भी अभिमान कर बैठी इतना कुछ कहने के बाद

आख़िर वह भी तो है औरत ज़ात !