शाम को जब घर लौटते हैं तब लगता है

सुबह ठीक होगी

और अगले दिन नई सुबह एक नई उलझन के साथ आती है

नए रोज़ नए उलझन के तले दबते चले जाते है

आइने पर नज़र पड़ी तो दिखा

आंखों के काले घेरे दिन ब दिन और सियाह होते जा रहे हैं

मानो सारी - सारी रात चूल्हा जला हो

चूल्हे के धुएं में लिपाई की चीखें आसानी से देखी जा सकती हैं