इस दर उस दर फिरता रहता है वो बंजारों सा
आंखों में बस इक घर का ख्वाब लिए
अपने वजूद की तलाश में भटकता रहता है
हजारों अनसुलझे सवाल और सिर्फ चंद जबाब लिए
लोग समझते हैं पागल उसको
मगर वो चलता ही जाता है
अपनी धुन में सूनी राहों पर अकेले
सीने में इक इंकलाब लिए
बहुत कम हैं जरूरतें उसकी इक छोटी सी पोटली में
लिए फिरता है अपना सारा मालो असबाब लिए
बांटता ही रहता है खुशियाँ औरों को
अपने सीने में गम बेहिसाब लिए
कोई शर्म नहीं उसको अपने गम दिखाने में
फिरता है अपने जख़्म बेहिजाब लिए
पांव उसके जमीं पर रहते हैं मगर
फिरता है वो निगाहाें में फलक के ख्वाब लिए

