जिन राहों पर कभी चले थे हम तुम साथ साथ

उन राहों पर तेरे कदमों के निशां ढूंढ़ता हूं

तेरे लबों के तबस्सुम की हकीकत पता है मुझे

तेरी मुस्कुराहटों में तेरा दर्दे निहां ढूंढ़ता हूं

दुनिया की भीड़ में कभी खो जाता हूं इस तरह

कुछ लम्हों की खातिर खुद अपना पता ढूंढ़ता हूं

क़ैद सा होकर रह जाता हूं कंक्रीट के बंद कमरों में

कभी यूं ही टैरेस पर जाकर खुला आसमां ढूंढ़ता हूं

अपनी ही उलझनों में मशरूफ अपने ही ख्यालों में गुम

अपने जीने का सबब अपने वजूद का पता ढूंढ़ता हूं

कोई तो होगी मुझे भी लग जाए जो मेरे भी काम आये

इस मंदिर उस मजार जाकर ऐसी कोई दुआ ढूंढ़ता हूं