वह दिन भी था
अन्य दिनों की तरह ही,
बिल्कुल सामान्य,
घटना रहित,
जिसमें नहीं हुई कोई नवीन बात,
नहीं था जिसमें
कोई उत्तेजना
कोई उत्साह ।
चल रहा था दिन,
अपने निर्धारित पथों पर
धीमे-धीमे
थका-थका सा।
जब अपने
आख़िरी पड़ाव पर था,
ऊबा-ऊबा, उदास-उदास सा दिन,
और सांध्य का सुरमई उजाला
रात्र की कालिमा में
विलीन हो रहा था,
कि अकस्मात
तुम्हारी स्मृति,
मेरे मानस पटल पर उभरी।
मुझे लगा कि जैसे
निशा की नव कालिमां में,
न जाने कितने छोटे-छोटे
जुगनू टिमटिमाते हुए
छिटक गए हो नभ में
और उन्होंने ढक लिया
देखते-देखते ही
सारा आकाश।
मुझे लगा कि जैसे
नभ के अधरों पर
गूंजने लगा हो
कोई मद्धम-मद्धम सा
सुरीला गीत
जिनसे जाग उठी
मेरे मन में
तुम्हारी सोयी हुई स्मृतियां।