मेरे कान सुनते हैं न जाने कितने स्वर

मेरी दृष्टि पढ़ती है

न जाने कितनी दृष्टियों की भाषा।

मेरे हृदय तक पहुंचता है जितना स्नेह, प्रेम

वह प्रायः भर देता है मुझमें

एक क्षण में अनिवर्चनीय सुख

पर अगले पल ही कर देता है उदास मुझे

नहीं है मेरी पात्रता

नहीं हूं मैं अधिकारी

जो मिल रहा है उसके शतांश का भी।

पर फिर भी

उन समस्त स्नेहों को समेटकर रख लेता हूं मैं

हृदय की अतल गहराइयों में

किसी कंजूस की तरह

जो रख लेता है अपनी सारी जमापूंजी

एक बंद तिजोरी में

और छुपाकर रखता है सबसे उसकी चाभी।

मैं नहीं चाहता लेशमात्र भी खोना उसे

जो मिल रहा है।

बस दुख इस बात का है कि

नहीं दे सकता मैं उत्तर

उन सारे स्वरों का

जो पहुंच रहे मेरे कानों तक

ये भ्रम भी हो सकता है।

नहीं मिला सकता दृष्टि मैं

उन दृष्टियों से देने को उत्तर

जिनमें हैं भाव मेरे लिए स्नेह के

प्रेम का उत्तर

तो संभव ही नहीं है।

ये समझना

मेरे भ्रम की पराकाष्ठा हो सकती है।

पर कितना दुखदायी होता है

इतना सब कुछ लेकर

एक स्वार्थी की तरह कुछ भी न लौटाना।


2.कई बार जानते हैं हम ,

जो मिल रहा है हमें

उसकी लेशमात्र पात्रता नहीं है हममें ,

पर अपनी अपात्रता जानते हुए भी

जो मिल रहा है उसे ठुकरा देना

एक निष्ठुर साहस का काम है,

वो भी तब जब वो स्नेह और प्रेम हो

भले ही दूर से ,भले ही ही कल्पनाओं में।

एक अकिंचन से कोई कैसे आशा कर सकता है

कि वो किसी भी अमूल्य चीज को ठुकरायेगा।

अमूल्य अभौतिक उपहारों का प्रतिदान

सम्भव ही नहीं है।