जग चाहता है सबको
अपनी धुन पर नचाना
जग चाहता है
औरों के जीवन पर
व्यर्थ अपना अधिकार जताना
करता है छुप छुपकर
कितने ही तीखे वार
जग सारा घात लगाये बैठा है
सुख न पहुंचे कभी तेरे द्वार
माना पाये होगें दुख तूने
पर फेंक अब तूं ये चोले उतार
तू अलग है औरों से पर
दो घड़ी उसके साथ बह
चल रही है जो नई बयार
अपने बंधनो अपनी छवि से
मुक्त हो जा एक बार
लेकर नये स्वप्न अपने
तू पंख अपने पसार
उड़ जा नील नभ
जीवन असीमित अपार
बाज उड़ते अकेले
नई ऊंचाईयां छूने को
तुझे हो क्यों किसी और
की प्रतीक्षा, इंतजार
अनिल 17.10.2020

