कभी कभी हम ऊंचाईयां चढ़ते हुए

जिन लोगों की सहायता लेते हैं

जिनके कंधों का सहारा लेते हैं

जिनके हाथों को थामते हैं

बहुत ऊंचाई पर पहुंचने पर

वो लोग हमें बौने से नज़र आते हैं

उनका अस्तित्व हमें क्षुद्र लगता है

उनकी आवाज़ें हम तक पहुंचना बंद कर देती हैं

या हम उन आवाज़ों को सुनना बंद कर देते हैं

उन हाथों को बेरहमी से झटक देते हैं

जिन हाथों ने सहारा देकर

हमें ऊंचाई तक पहुंचाया था

हमें संभवतः आभास नहीं होता

हमारे शिखरों की ऊंचाईयां

उन्हीं नीचे खड़े बौने सदृश लोगों की

दृष्टि प्रदत्त है

वो दृष्टियां जो बदल भी सकती हैं

वो कंधे जो हट भी सकते हैं

वो हाथ जो सिमट भी सकते हैं

वो अकेली आवाज़ें

जो समवेत स्वरों में

एकाकार भी हो सकती हैं