जाने ,न जाने क्यों
हम कुछ उलझे हुए सिरों को
पकड़ कर रखते हैं।
बस इस उम्मीद में कि
शायद वो सिरे कभी सुलझ जायें
सिरे सुलझते ही नहीं
पर हम उलझते जाते हैं।
कुछ ऐसे ही होते हैं
टूटे हुए, छूटे हुए
टूटते हुए संबंधों के सिरे
जिन्हें हम
पकड़कर रखना चाहते हैं
बस इस आशा में कि
शायद सब कुछ पूर्ववत हो जाए ।
शायद जो उलझा है वो सुलझ जाए
जो टूटा है वो फिर से जुड़ जाए
जो गया है शायद वापस मुड़ जाए।

