वो लोग कौन थे
जो रात को फुटपाथों पर थे सोये
एक तेज चलते ट्रक से कुचलें जाएं
और चिर निद्रा में सो जाएं
कौन थे वो आखिर घर गांव, ठौर ठांव
छोड़कर कहां से थे आए
क्या थे कुछ उनकी आंखों में सपने
या बस जिंदा रहने की मजबूरी थी
जीवन की नश्वरता का,
जीवन की क्षणभंगुरता का
ऐसी हर घटनाएं
उनकी मृत्यु असहाय ,दुखदायी ,असमय
हमको इतना तो पाठ पढ़ाएं
कोई पता नहीं कब क्या हो जाए .
किसकी सांसें कब हो जाएं मौन
कौन कहां कब कैसे उठ जाए
तांडव पर तांडव हम करते कितना
पर जहां ग्लैमर न हो ओढ़ लेते हैं।
सुविधाजनक मौन
हम बंद कमरों में लिहाफ ओढ़े
करें बहसे गर्मागर्म कितनी
प्रेम पर लिखें महाकाव्य
पर कहो इस घटना पर
हमने कुछ प्रश्न उठाए
ग्लैमर विहीन मृत्यु भी कहां
कहां आकर्षित हमें पाए
कहों क्या उन दुखी आहत परिवारों के
दुख के कातर स्वर
हमारे कानों तक भला पहुंच पाए
क्यों सोयी सी रह जाती हैं
हमारी सारी संवेदनाएं
कहो तुम क्या हमने तुमने
दो अश्रु भी बहाए