पता नहीं क्यों

पर आजकल

मुझे तुम्हारे शब्द ,तुम्हारी बातें

आश्वस्त नहीं कर पातीं ,

पहले तुम्हारी उपस्थिति से

मेरा विश्वास बढ़ जाता था

पहले तुम्हारे शब्दों पर

जैसे मुझे अटूट विश्वास हो जाता था

तुम्हारी हर कही बात मुझे भरोसा दिलाती थी

 पर अब ऐसा नहीं होता।

हमारे मध्य बहुत कुछ बदल सा गया है।

मेरे मन में

कुछ अकुलाहट सी ,कोई व्याकुलता सी रहती है

कुछ अघटित

घटित होने की आशंकाएं

हर समय मुझे घेरे रहती हैं।

पता नहीं क्या कुछ बदल गया है

तुम,मैं या फिर समय

पर है सत्य यही कि

तुम्हारी बातें, तुम्हारे शब्द

तुम्हारी उपस्थिति

अब मुझे आश्वस्त नहीं करतीं।


2.मैं जानता हूं कि मेरी उपस्थिति से

कोई खास फर्क नहीं पड़ता यहां

पर यहीं रहना चाहता हूं

मैं अपनी

नगण्य उपस्थिति के साथ।


3.कुछ अनुपस्थितियां

कितनी हमको चुभती हैं

कितनी हमको खलती हैं

हम कर नहीं पाते व्यक्त

पर रहते हैं चिंतित

उनके लिए भी

जिनसे नहीं होता है कोई रक्त संबंध

नहीं होता है कोई सम्मुख वार्तालाप

बस उनका होना ही

एक अनकही,अजीब़ सी

आश्वस्ति प्रदान करता है

उनका न होना कुछ खटकता है।

लगता है कुछ मौन संवाद

रुक से गये हैं

पूरी तरह मौन हो गये हैं।


4.

तुम्हारी अनुपस्थिति का

कोई न कोई उचित कारण होगा,

तुम्हारे मौन के पीछे भी

कोई अभिप्राय होगा ,

तुम्हारे कुछ न कहने का भी ,

कोई न कोई अर्थ होगा,

पर इस भागते

कोलाहल भरे प्रदर्शन के समय में ,

कौन जानना चाहता है,

तुम्हारी अनुपस्थिति का कारण,

तुम्हारे मौन का अभिप्राय ,

तुम्हारे अनकहे का अर्थ।