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तुम्हारी स्मृतियां

मन की दीवारों के कोनों में

लगा रखी है मैने कितनी खूंटियां

जिन पर टांग रखी है

मैंने तुम्हारी स्मृतियां

तुम्हारे होने न होने से

अब मुझे कोई

अंतर नहीं पड़ता

जब जी चाहे

जैसा चाहे

वैसा पल

मैं जी लेता हूं

उतारकर उन खूंटियों से

वैसी ही कोई भी स्मृति

फिर

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