मन की दीवारों के कोनों में
लगा रखी है मैने कितनी खूंटियां
जिन पर टांग रखी है
मैंने तुम्हारी स्मृतियां
तुम्हारे होने न होने से
अब मुझे कोई
अंतर नहीं पड़ता
जब जी चाहे
जैसा चाहे
वैसा पल
मैं जी लेता हूं
उतारकर उन खूंटियों से
वैसी ही कोई भी स्मृति
फिर टांग देता हूं वापस
उन्हें उन खूंटियों पर
किसी और दिन के इस्तेमाल के लिए
सोचता हूं कभी जब तुम
वापस आओगी
तब तुम्हेंं दिखाउंगा
उन खूंटियों से उतार उतारकर
एक एक स्मृतियां
तब तुम समझ पाओगी
कि मैंने तुमसे
कितना प्यार किया था
अनिल 29.09.2020

