पढ़ता हूं मैं हर रोज तेरी भेजी हुई चिठ्ठियां
कभी-कभी कई बार ,
सोचता हूं तुझे लिखूं कुछ लम्बे जबाब
कल्पनाओं मे लिखता भी हूं
पर मेरा साहस जबाब दे जाता है
कुछ सपने इतने कोमल होते हैं
कि उनका यथार्थ के कठोर धरातल से
टकराकर टूटना तय हैं
तुम्हारी छवि मेंं मैंने क्या छवि देखी थी क्या बताऊंं
अब तुम्हे देखकर मैं क्यों घबरा जाता हूं
कई बार तुममें मुझे कौन दिखता है
मैं एक अपराध बोध से ग्रस्त हो जाता हूं
मुझे कोई अधिकार नहीं इस तरह के
अर्थहीन स्वप्न देखने का
तुम्हें या किसी को भी पीड़ाएं देने
या पीडा़ओं के सागर मेंं धकेलने का
मैंने देखा तुम्हारी वीथिकाओं में घूमते हुए
तुम्हारी सोच तुम्हारे सपने हैं एक अनंत विस्तार लिए
तुम्हें जीना चाहिए भरपूर अपने सपनों को
रखकर हर दुख से परे
जीवन भर अतीत के दुखों से
लिपटकर तो नहीं रहा जा सकता
दुख सृजन की प्रेरणा बने अच्छा है
पांव के बंधन मत बनने दो
मैं पढ़ता हूं और पढ़ूंगा तुम्हारा लिखा सब
कभी जबाब भी दूंगा इसी तरह
मैं नहीं जानता ये तुम तक पहुंचते भी हैं
या ऐसे ही गुम हो जाते हैं
तुमसे है मुझे गहन अनुराग
पर इसकी कोई परिणति कभी होगी
मैं नहीं जानता
अज्ञात से जब आवरण उठेगा
जब मन मेंं बसायी छवि से बेमेल
कोई कुरूप सा झुर्रीदार चेहरा आकर कहेगा
तुम्हारे सम्मुख
कि मैं हूं स्वप्न तुम्हारा
तब क्या कर पाओगी स्वागत बांहें पसार
कल्पनाओंं के घोड़े दौड़ाता जग
अपने पैने नाखूनों से
लोहुलुहान क्षत-विक्षत कर देगा इन सपनों को
प्रश्न सारे होगें मेरे लिए कि मुझे क्या हक था
ऐसे सपने देखने का
तुमको जीवन में ऐसी पीडा़एं देने का
तुममें है साहस
पर मैं डर जाता हूं ऐसे सपने से