तुम आये मेरे जीवन में चुपचाप
नयनों के द्बार से होते हुये
समा गये मेरे हृदय की अतल गहराइयों मेंं
करते रहे निरंतर अपना विस्त्तार
फिर एक दिन अचानक
जैसे तुम आये थे
वैसे ही चले गये जीवन से
बिन कुछ कहे
बिन कुछ सुने
पर जो तुमने घेरा है मेरा हृदय
वहां से नहीं गये
न हटे ही तुम वहां से
मैनेंं सोचा न था कभी
कि कोई अपरिचित, अनाम
कर सकता है कभी मेरे हृदय में
इस तरह अतिक्रमण
मैं तुम्हें झटककर दूर फेंकना चाहतीं हूं
अपने हृदय से ,दूर बहुत दूर
पर मैं क्या करूं
अब तुम समा नहीं पाते मेरे हाथों में
छिटक जाते हो बार बार
कर लिया है तुमने विस्तार इतना
मेरे अपने हृदय पर अधिकार इतना

