आलोकित हो पथ सारे तेरे
तेरे ही अंतर के प्रकाश से
तिमिर सारे मिटें पथ के
दीप प्रज्वलित हो कितने ही पथ में
और मन में भी तेरे सहस्र दीप जलें
हृदय में कामनाओं के कितने ही नवल स्वप्न पलें
जो न समझ सके मन ही तेरा
तूं जीवन भर व्र्यर्थ ही क्यों उनका शोक मनाएं
तूं एक पल भी उनके लिये क्यों गवाएं
सहेजकर रखे उनकी स्मृतियां
अंतर में दुख इतने पाले
जीवनभर उनके लिये क्यों जले
सामर्थ्य है जब तुझमें औरो के अंधेरे मिटाने की
फिर तूं स्वयं क्यों रहे किसी भी अंधेरे में घुटकर
तम के सारे बंधनों से निकल
सहज मन मृदुल हास लिये
जीवन पथ पर नव स्वप्न
नवल आस लिए चल।
आज है प्रकाश पर्व इसलिए
न हृदय में न कोई नैराश्य पाल
तेरे हृदय की मुस्कानों से
कितने अधरों पर मुसकान बिखरती है
तेरे हृदय में पलते स्वप्न सारे जानती है
तेरे अंतर की पीड़ाएं सारी
मां को कितनी चुभती हैं
अवसर जीवन में आते हैं कितनी ही बार
जब चलना पड़ता हैं औरो के साथ
हंसना ही पड़ता है
औरों के अधरों पर हास लाने के लिये
जलना पड़ता है स्वयं भी
औरों के तिमिर मिटाने के लिए

