जब तू मेरे पास नहीं होती और रात गहराती है
दिल को बस तेरा ही ख़्याल तेरी ही याद आती है
लम्बी रातों की हर सिम्त बिखरी
ख़ामोश तनहाईयां डरातीं हैं
तेरी सांसों की सदाएं होतीं मेरे साथ नहीं
मेरे बाजुओं की जद में होता तेरा बदन नहीं
मेरे हाथों में आ सकता तेरा हाथ नहीं।
कमरे में तेरे जिस्म की उड़ती खुशबुएं नहीं
तेरे गेसुओं में फिरा सकता मैं अपनी उंगलियां नहीं
तेरे रूखसारों पर मैं फिरा सकता अपना हाथ नहीं
तेरे ख्वाबीदां चेहरे पर डाल सकता निगाह नहीं
नींद का आंखों में कहीं नामों निशां नहीं
गुजरती भी तेरे बग़ैर ये लम्बी रात नहीं
तेरी गैर-मौजूदगी मुझे इस कदर तड़पाये
अब ये भी तो कोई ठीक बात नहीं
पर सच तो ये है जो तेरे बग़ैर गुज़रे
उससे तन्हा तो कोई रात नहीं

