हर बार कोई नई सरहद खींचते हैं

फा़सला बढ़ाते हैं,कुछ नई दीवारें उठाते हैं

किसी नई जंग का पैग़ाम देते हैं

यही तो उन रहनुमाओं की रहनुमाई है।


जिसे यहां कुछ भी पता नहीं होता

वो भी आसानी से बनकर वाइज़

कहता है यही दुनिया भर से कि

ख़ुदा से उसकी आशनाई है।


वह चंद ख़ुश क़िस्मत लोग ही होंगे जहां में

जिन्हें खारो से गुज़रे बग़ैर मिलते हैं गुल

हक़ीक़त है यही,जो गुज़रा है कांटों भरी राहों से

फसले बहार भी उसी के हिस्से में आई है।


ज़माने के उछाले पत्थरों की परवाह क्यों करना

उनसे तुम्हें क्या लेना,वो तुम्हारे हमसफ़र नहीं

तुम्हारे कारवां के मुसाफिर नहीं

महज़ तुम्हारी राह में खड़े तमाशाई हैं।