पूछो स्वयं से तुम किसके स्वर हो

क्यों जब,जहां बोलना रहता है

हो जाते हो मौन

जब ,जहां नहीं होती

कोई आवश्यकता

तब हो जाते क्यों इतने मुखर हो।


जब कहना होता है

तो चुप रह जाते हो ,

जहां नहीं सहना होता है

वहां सब कुछ सह जाते हो ।

अंतर की व्यथाएं रहते हो

उड़ेलते ,शब्दों से अपने

जग की व्यथा

कर देते अनसुनी ,अनदेखी

जैसे पलता अंतर में कोई

अनदेखा अंजाना डर हो।


पूछना कभी स्वयं से

क्या पूरी तरह अपने भी स्वर हो।