झूठे थे उनके सारे ही कथन

किया व्यर्थ जिनके लिए व्यथित अपना मन।

कहां दुख था एक भी भला तन को

बस न जाने क्यों जीवन भर दुखी सा रहा मन।

कहां भला हृदय में इतनी पीर थी

सूखे-सूखे ही तो रहे सदा नयन।

आम लोगों की पीड़ाओं का ढिंढोरा पीटते पीटते

कुछ लोग हो गये कितने खास जन।

कुछ लोग बस बात ही धरा के दुखों की करते हैं

नयनों में तो उनके सर्वदा बसता है गगन।

शब्दों की शहद में लपेटते हैं भावनाएं अपनी

सावधानी से करते हैं सारी भाव भंगिमाओं का चयन।देखना कभी ध्यान से उनको, जिनकी मूक रहती हैं पीडा़एं, बोलते हैं कितना उनके सूने सूने नयन।