कहते हैं सब
बंजर हो गयी है
मन की सारी धरती
जिस पर कभी
सपने उगते थे
मुरझाया वो सारा उपवन
जिसमें इच्छाओं के कितने
कोमल कुसुम खिला करते थे
बीता समय वो सब
जब हृदय में पलती थी प्रीत
जब अधरों पर रहते थे कितने ही गीत
क्यों धरती बंजर हो जाती है
क्यों मन मरुस्थल हो जाते हैं
क्यों सूख जाती हैं नदियां
क्यों आखों के सपने मुरझाते हैं
क्यों गुलाब की जगह कैक्टस उग आते हैं
क्यों आंखों के बादल सूखे-सूखे
बिन बरसे रह जाते हैं
क्यों नहीं जिन्होने हमें भुला दिया पल में
हम उन्हें भुला नहीं पाते हैं
ढोते रहते हम उनकी स्मृतियों का बोझ
दुख को अपने सीने से लगाये
सोचते बस यही
क्या
रह गया है शेष
अब भी कुछ बाकी
या भग्नावशेष जो हैं बचे
विगत समय की हैं बस झांकींं

