रावण ने जो मुझे

बारह मास दिए थे सोचने हेतु ,

व्यतीत हो गए हैं उसमें से

दस मास अब तक

पर कोई भी समाचार राम का

अब तक तो नहीं मिला मुझे।


कभी-कभी मेरे मन में

उभरता है यह विचार कि

रावण ने नहीं दिए थे मुझे

सोचने के लिए बारह मास,

दिए थे यह मास उसने राम को,

यह सोचकर कि इस दीर्घ अवधि में

राम मुझे ढूंढ लेंगे और

होगा उसका कहीं ना कहीं 

सामना राम से,

या फिर इतनी दीर्घ अवधि में

मेरी आशाएं टूट जाएगी,

मेरा विश्वास खंडित हो जाएगा और

मैं स्वत: स्वीकार लूंगी

उसके कुत्सित प्रस्तावों को ।


मेरी सारी आस टिकी है

भविष्य की संभावनाओं पर

उस भविष्य पर जिसके बारे में

मुझे किंचित भी कुछ ज्ञात नहीं।


मैंने बिताए ये विगत दस माह

जैसे दस वर्षों की भांति

अनेक दुविधाओं , द्वंद्वों,

दुश्चिंताओं में घिरे हुए।


अनेक संभावनाओं को

अपने अंतर में संजोए हुए

अपनी आस अपना विश्वास

अपना साहस

अपना धैर्य बचाए हुए।


मेरा विश्वास अटूट तो है

मेरी आस अदम्य 

मगर मेरी आस

अब क्षीण होने लगी है,

मेरा विश्वास टूटा तो नहीं

पर डगमगाने लगा है।


मुझे ज्ञात नहीं कि

कब मुझे मिलेगी

इस बंदी जीवन से मुक्ति

रह रह कर मेरे मानस पटल पर

उभरती हैं विगत की स्मृतियां

मिथिला की स्मृतियां

तात जनक की स्मृतियां

मात सुनयना की स्मृतियां

उर्मिला, मांडवी,श्रुतकीर्ति की स्मृतियां

सखियों की स्मृतियां

बचपन की स्मृतियां

यौवन की स्मृतियां

राम से पहले मिलन की स्मृतियां।


अयोध्या की स्मृतियां

माता कौशल्या ,

कैकेई,और सुमित्रा के

अपार स्नेह की स्मृतियां

वन गमन से

अब तक के जीवन की स्मृतियां

हर पल की स्मृतियां

बीते हर एक क्षण की स्मृतियां।


दुखों से लड़ती हैं

मेरी सुख की स्मृतियां।


स्मृतियां ही तो है

इस एकाकी बंदी जीवन में

मेरे जीने का आधार।


यदि मैं किसी 

सामान्य जन की भार्या होती

तो टूट चुका होता

मेरा विश्वास अब तक,

पर मैं हूं अर्धांगिनी राम की

कैसे भला टूट सकती हूं मैं

कैसे भला

टूट सकता है मेरा विश्वास।


पर मुझे कुछ भी तो ज्ञात नहीं कि

राम कहां है

किस स्थिति में है,

उन्हें यह अब तक

पता भी चला भी कि नहीं

मैं यहां हूं इस लंका में।

यदि उन्हें पता है मेरा

तो वह कब तक पहुंचेंगे

लंका के द्वार तक

मेरी मुक्ति के लिए।


कितना अच्छा होता,

यदि कोई आकर

मुझको यह सब कुछ बतलाता

संदेशा राम का

आकर मुझको सुनाता,

तब मेरी आशाओं को बल मिल जाता,

मेरे डगमगाते विश्वास को

थोड़ा संबल मिल जाता।